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किसी ख़याल में घोला था

किसी ख्याल में घोला था मैंने तुझे शायद

 

तूने गले लगाया था ना जिस रोज़

तेरी रूह पी गया था मैं कच्ची

जिस्म से जिस्म की ओख लगा कर

तेरे रुखसारों से

जब तक आंसू गिरते नहीं देखे थे मैंने

मुझे असल माने टीस के तब तक

शायद मिले ही नहीं थे

तूने एक बुलबुले सा फोड़ दिया

मेरी हस्ती का वो जो ग़ुबार था

जिस रोज़ मुझे ज़ुबानी पुकारा था तूने

मुझे यक़ीन है ये तू मानेगा नही

फिर भी बताये देता हूँ की मुझे यक़ीन है

काग़ज़ों के पीछे

सियाही के सहारे

अपने तखल्लुस की आड़ में

अब तलक

तुझ ही को ढूँढा है मैंने यक़ीनन

हाँ तू मेरा क़लाम है

हाँ तू मेरा क़लाम है

हाँ

तू ही मेरा क़लाम है

 

किसी ख़याल में घोला था मैंने तुझे शायद

रफ़ू

सी सी गयी है
रूह में उनकी
मेरी रूह-ओ-ज़ीस्त
कुछ यूँ
की मुहब्बत
ने अब मुझे

रफ़ू कर दिया है

उम्मीद

कायनाती गुलिस्तां की तलाश में निकली
एक महकती हुई आरज़ू को अगर
ज़िंदगी की लू के कैड़े से थपेड़े
झिंझोड़ें डरा दें
परेशान सा छोड़ें
उसे ओस बना दें
उस की सबा से उस की
दोपहरों को तोड़ें
फिर कहाँ तलक उसकी महक जाएगी बोलो
वो महकेगी भी
या लू में दहक जाएगी बोलो
ये कहना कठिन है की जो होगा सो होगा
फिर भी यूँ कहो की आदतन यूं ही कहना होगा
ज़िंदगीनुमा भभकती सी लू के ठीक बीचोंबीच
तमन्ना के सराबों को रखते हुए मद्देनज़र
कायनाती गुलिस्तां की तलाश में बेसबब
नखलिस्तान सी आरज़ू को
यूँ ही महकते रहना होगा

सुनो शायर

हो सकता है
की कभी ना हुआ हो
ख्वाब से चूल्हे में उठती
तमन्ना की आंच का
नकली ये धुआँ हो
यूँ भी तो हो सकता है
की हो ये महज़ टोटका कोई
किसी गुज़रते हुए जादूगर ने
बस ऐंवई फूंका हो
चलो मान लिया जाए
की ऐसा या वैसा
ये कुछ भी नहीं है
दिमागी बवाल है फकत
या होने से ज़्यादा
मुझे ना होने पर यकीन है
सुनो शायर
चुप रहो
आनन फानन ना बको
ढीठ ठहरे
ढीठ तुम
जो भी है
सो है
पहेलियां बनाने से अब
भला क्या ही मिलेगा
जो मिल रहा है वो भी
अघूरा ही मिलेगा
सुनो हासिल की आशिकी में
ये जो ‘है’ ना गवां देना
खुद ही बना के मर्ज़
फिर खुद ही ना दवा देना
‘असर’ है ये मेरी जान
यूँ ही पैदा नहीं होता
बीत जाती हैं मुद्दतें
नसीबन ऐसा नहीं होता
एहसास का दरिया है – समझो
बातें बनाना छोड़ दो
उस पार जाना है गर तुम्हें
उस पार जाना छोड़ दो

28 शिवालिक

ज़र्द सभी रातों के
सूने सूने से समंदर
कभी मेरे तो कभी तेरे दिल के अंदर
झुंझलाये हुए ख़्वाबों की लहरों में गोते लगाते
बहरूपिये मुस्तक़बिल के अय्यार बवंडर
सर-ए-आम सर-ए-ख़ास
ऐसे या वैसे वो सारे के सारे
सराबी से लबालब
हक़ीक़तों के मंज़र
गूंजते हैं जब बीचोंबीच ज़हन के
ज़लज़ले आते हैं फिर
सीरत-ए-सुखन के
छिटक देती है फिर ज़िन्दगी
पल भर को ऐसे रूह
मैं-मैं नहीं रहता
न तू रहती है तू
हमीं हम से जुदा कर दे
तुम ही बूझो ये बला क्या है
हम नहीं जानते
इस सिलसिले का
सिला क्या है

बॉम्बे ड्रीम्स

अमलतास के पीछे से
पच्छिम की ओर से आती है जो

पछुआ है की आस है वो

है सपन नगर के डाकिए की
साइकल की वो घंटी क्या

या माइग्रेटरी कोई चिड़िया है
किसी फैक्ट्री से उड़कर आई है

धनक कड़कती है ऊपर जब
तभी तो बिजली बनती है

फिर फलक पे कोयला मल मल क्यों जाने
‘ये’ बे-मतलब इतराते हैं

‘ये’ मानी वो वो सारे जो
पुरवा के हत्यारे हैं

वही जो मेहा-नीम-पहाड़ी-बेर-पलाश-गुरैया को
अब है सब और फिर भी जबरन
देखो इतिहास बताते हैं

रंग मिट चुका है
ख़याल के पर्दों का भी जब से वो
बे-मौसम की बारिश में
अक्सर यूँ ही धुल जाते हैं

अमलतास के पीछे से

जाता है धनक की घाटी का रस्ता
और सुनते हैं हम ये भी
ख्यालों के रंगरेज़ सभी

वहीँ पे पाए जाते हैं

वो दाम भी ठीक लगाते हैं
और काम भी बढ़िया करते हैं

बस थोड़ी बहुत मशक्कत है तो
घाटी तक का सफर है बस

अब पुरवाई के बाशिंदे

किस सोच में डूबे जाते हैं

अम्मी

सबा की आमद से

कुछ ही देर पहले

पहन लो अपनी नेमतें

ओढ़ो दुआएं

भूल जाओ

की जिस्म जैसा भी है कुछ

या दुनिया में है

सब फलाना फलाना

अगर कोई है

तो बस अम्मी है

और बस

यही सच है

की मिरे ख़्वाबों

और आदतों में

उस की हामी का फ़र्क़ है

जब घुटनो पे चला करते थे

तब की सोचो

और बूझो

ज़िन्दगी के दायरे

अब भी

एक दुपट्टे भर से

माप सकते हो क्या

सबा की आमद से

कुछ ही देर पहले

सूरत-ए-आरज़ू

जब सो रही होगी

नमाज़ी बनो

ओढ़ो वही दुपट्टा

और सबा से कहो

खुदा-या

वो आए तो

यूं आए

सुन री सजनिया

सुन री सजनिया
अब कै बारे
अधूरा सावन आयौ री

 

मैं बरखा मूसलधार अकेला
भीगे नैन नहायो री

 

हूक सुनाई देवै थी बस
हूक सुनाई देवै थी ना
कूक सुनाई देवै थी

 

जब जब कोयल कूकी तब तब
वा नै मोहे रुलायो री

 

बहता पानी गिर जावै और
गिरता पानी रुक जावै और

 

मुख पै छोड़ै छाप
जिया ने ऐसौ दरद बहायो री

 

अब कै बारे
अधूरा सावन आयौ री

रोज़गार के सिलसिले

एक ज़िंदा लैंप
कॉपी के पिछले पन्ने
और बिखरे थके ख़याल

बदहवास हैं नज़्में और शायर बेहाल

 

रोज़गार के सिलसिले और धूप सेंकती छत

ज़मीं पे बिखरे जवाब हैं आसमानों पर सवाल

 

नज़्म में गहरे गहरे गड्ढे कलम के छोटे पैर

लांघ जाए दीवार सुखन की किस की भला मजाल

 

आँख से टपका हवा हुआ और ज़हन को ले कर गोल गया

गिरा था जो आंसू ही था या था गिरा बवाल

 

भरी भरी सी ओखली भी तुझे लगेगी खोखली

इश्क़ में दे दे सिर और फिर मूसल का देख जमाल

इस नज़्म को ध्यान से सुनना

ज़रा ध्यान लगा के सुनना

इस नज़्म में

छोटे बड़े

सभी पंछियों की चहक है

धुंधले बादलों के पीछे

रंग रोगन करते

सूरज की गुनगुनाहट है

और तुम्हे पुकारती

मद्धम चाल चलती

पछुआ की फुसफुसाहट है

बहुत दूर बन रही

बहुमंज़िला ईमारत की

आखिरी मंज़िल पर खेलते

मज़दूरों के बच्चों की खिलखिलाहट

और तड़के की बारिश की

अधसूखी बूँदों की

सौंधी सी गूँज है

इस नज़्म को ध्यान से सुनना

ये नज़्म नहीं

ये असल में

मेरे टैरेस पर बिखरी हुई

शाम की आवाज़ है

काश

काश

ज़मीं की धड़कन

रुक जाए

और ठहर जाए

सब का सब

वक़्त मिट जाए

सब की ज़ुबानों से

और टूट कर कलाइयों से

गिर जाये

ज़मीं पर

फिर चांदनी के संग

फुर्सत ही फुर्सत बिखरे

और काली घटा के पीछे से

उजले चाँद की माफ़िक़

नज़र पे आओ तुम

काश !

सुखन

बहुत कोशिश करने पर भी नहीं आती
दुआ आती है लबों पर इल्तजा नहीं आती

 

आतीं हैं मुझ तक सारी कायनात की आवाज़ें
बस इक तेरी ही सदा नहीं आती

 

महके हुए लम्हों में सांस लेना दूभर है
वक़्त में खुशबू क्यूँकर समा नहीं पाती

 

बुझा हुआ वक़्त भी अपने आप झुलस जाता है
हिज्र की तासीर आतिशी है विसाल की बरसाती

 

सुखन जो पनपे दर्द से वो सुखन नहीं है शिकवा है
लल्लन तुझे शायरी आते हुए नहीं आती

तलाश अशआरों की

तलाश अशआरों की है
मिल जाना तेरा
मुझे नज़्म-ए-हासिल
तू है कुछ इस कदर

 

देखो टपक रहा है
बादलों से खूं
दरिया का हुआ है
कुछ क़त्ल इस कदर

 

झुक जाये कहकशां
मैं उचक के तोड़ लूँ
बतला दे कोई
देखूं मैं
ख़्वाबों को किस कदर

 

जो भी पढ़े सहफे
तुझे उलझन क़रार दे
काग़ज़ों पे सलवटें
आईं हैं इस कदर

 

एक तू ही नहीं है
खामोश जहां में
एक मैं ही नहीं हूँ
जो चीखे है इस कदर

 

तेरा स्याह रंग है लल्लन
मेरा कुसूर पर
तुझे और किस रंग में
पाऊं मैं इस कदर

सावन में एक रोज़

कुछ उधर मुंडेर पर

तितलियों की तरह

पंख फर्रा रही हैं

कुछ इधर फर्श पर

जलेबियां सी तल रही हैं

एक तो अभी अभी

भीत का हाथ पकड़

कुछ सहमी सहमी सी उतरी है

और वहां खिड़की के कांच पर एक

उँगलियों से बार बार

कुछ लिखती है

फिर मिटाती है

फिर कुछ लिखती है

फिर मिटाती है

 

छोटी छोटी बूँदें

छत पर खेल रही हैं

मैं बस बैठा ताक रहा हूँ

ख्वाबीदा

चाहे ख़्वाबों को

काग़ज़ों पर घिसूं

चिपकाऊं

या फिर यूं ही रख दूँ बस

ना तो पूरे घिसे जाते हैं

ना चिपकाए

ना रखे जाते हैं मुझ से

कागज़ी ज़मीं पर पैर रखे नहीं की

मेरा हाथ छुड़ा

भाग लेते है ख्वाब

मैं भी फिर पीछे पीछे भागने की

मशक्कत नहीं करता

एक सर्द सा कोना ढूंढ कर

वहीँ पसर जाता हूँ

उधर वो

मुकम्मल की खिड़कियों से झांकते है

इधर मैं

उन्हें-मासूमियत और खुद को ताकता हूँ

इस फासले से उस ओर देखो

तो बहुत खुश से नज़र आते है ख्वाब

जब जी भर जाता है

तो मैं उन्हें वहीं छोड़

हक़ीक़त की सड़क का रुख कर लेता हूँ

कागज़ी ज़मीं के हरियाले मैदानों की घास

मेरे पैरों के माकूल नहीं

हाँ हक़ीक़त की तपती सी ज़र्द फटी सड़क

मेरे तलवों की हमशक़्ल है

छिल जाता हैं काग़ज़

इनके नीचे आकर

मैंने हक़ीक़त के सड़क पे पड़े

कई लहूलुहान ख्वाब भी देखे है

तभी तो चाहता हूँ की

ख़्वाबों को काग़ज़ों पर

घिस दूँ

चिपकाऊं

या बस यूं ही

सम्भाल कर रख दूँ

पर अफ़सोस

ना पूरे घिसे जाते है

ना चिपकाए

और ना ही सम्भाले जाते है मुझ से

ख्वाब अपने