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शब की सुनिये

चाँद की तारों से
और तारों की
फलक से सुनिये
शब् की आँखें भारी हैं
रब की पलक से सुनिये
शब् से ज़्यादा
सब से ज़्यादा
झीलों को ही
इश्क़ है शब् से
जब से वो
पानियों की परत है
शब् की झलक से सुनिये
आवाज़ भी शब् की
हवा कभी ना
मिटने देती हैं देखो
बरक़रार है
चाहे जितनी भी दूर तलक से सुनिये
शब् के जिगरी
बादल नख़रेबाज़ बगल में
रुई दबा कर बैठे हैं
गर रूठ गए
तो बरसेंगे
बातें इनकी
अलग से सुनिये
शब् भी कल बतियेगी
अभी उसे सो जाने दें
शब् की आमद
चाँद की आहट
तारों की खनक से सुनिये

सोचूँ की क्या लिखूं

सोचूँ की क्या लिखूँ और लिख भी ना पाऊं मैं
कुछ लिखूँ तो तब जब ‘सोच’ पाऊँ मैं

 

इस ताक में की आएँगे वो कभी
बार-ए-बार खुद ही को आऊं मैं

 

बीच बाज़ार हाल-ए-दिल क्या बयान करूँ
घर मेरे आओ की बतलाऊँ मैं

 

खैरियत से हैं वो भी खैरियत से हूँ मैं भी
अब बतलाऊँ भी उन से तो क्या बतलाऊँ मैं

 

देखिये मुझे ‘लल्लन’ की रुख हवा का देखिये
हो जाए वो जिधर की वहीँ जाऊं मैं

दिल रखिये तो कुछ यूँ

दिल रखिये तो कुछ यूँ की आसरा दीजिये
ये भी ना गर दीजिये तो फिर क्या दीजिये

 

हवा भी ना होगी यूँ बीतेगी ज़िन्दगी
उन आँखों के तले ना बैठा कीजिये

 

फुरक़त-ए-आतिश में फुर्सत जले फ़ुज़ूल
यूँ भी तो खाक़ है जल के भी क्या कीजिये

 

है आलम की हों सदियों में मुकम्मल मज़ामीन
वो कहते है की लल्लन’ सोचा कीजिये

तुम मुझे कितना याद आते हो

अलसाई पहाड़ी के पीछे

जब डूब रहा होगा सूरज

और ख़ुशी के मारे

हवा में डूबीं

कूदेंगी सारीं चिड़ियाँ

तब मेरी छत पर आना तुम

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना याद आते हो

रंगीन सियाही में जब मैं

अपने इकसार ख्यालों को

ख़ुशी ख़ुशी यूँ ही ऐवईं

काग़ज़ पर बो देता हूँ

कभी किसी दिन ऐसे ही

फिर उस मंज़र के बीचों-बीच

मद्धम चाल में आना तुम

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना याद आते हो

ये गिरा चाँद जब दिन का पैर

निंदिया की दहलीज़ पड़ा

वो बुझी रात जब दोपहर के

काम का एक मरीज़ मिला

और वो टूटे सन्नाटे

यूं टुकड़े टुकड़े हो हो कर

हर रोज़ सितम ये जब सारे

मैं आसमान में बना के तारे

आँहें जड़ता जाता हूँ

तब जुगनू बन चमकाना दिल

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना…

खानाबदोश

उस की आँखों में छिपे ख्वाब को

उकेरा था मैंने

और धुंधली सहर का सूरज

उसे दिखाया भी था

बड़ी मन में थी सबा से बतियाने की उस के

उसे फुसफुसाती हवाओं ने

पास बुलाया भी था

वो धनक ढूंढ़ता घूम रहा था

शहर के कोने कोने में

तंग गलियों ने उसका हौसला

बढ़ाया भी था

घने कोहरे में गुम हो जाने की

लत सी पड़ गयी थी उसको

जाड़ों ने उसे बहुत

बहलाया भी था

वो परवाज़ था खुद

पहाड़ी चरवाहे की तमन्ना जैसा

खानाबदोशी का यक़ीनन

वो सरमाया ही था

कल का ख़्वाब

सुनना ज़रा हवाओं से
कल रात
संग सारी कायनात
उन्हें भी
तुम्हारी सी कुछ
सुना रहा था
ज़मीं-आसमां के
सटे सटे से कानों में
तुम सा ही कुछ गूँज रहा था
चाँद पे भी तो
पिछली शब को
तुम सा ही कोई बना हुआ था
कल ही की तो बात है जब वो
सीधी सी एक ज़ुल्फ़ तुम्हारी
बेसुध हवा ने लहराई थी
कल ही था जब
नैन तुम्हारे
सूखी सी इस धरती पर
बनकर मोती बरसे थे
कल ही था जब
पलक तुम्हारी
लेटे लेटे साहिल पर
शाम का सूरज गिरा रहीं थीं

कल ही की ये बातें है सब
मुझे ये मेरे ख्वाबों ने अब
सुबह सुबह बतलाईं है

हसरत

कहने को तो

ज़िन्दगी भर की हसरतें हैं

एक वो चाँद है

और तारें हैं

पश्मीने वाली रात भी है

और रुई के बादल सारे हैं

नज़र से झटके छींटे हैं

जो हर ख्याल के रंग में मैंने

आसमान पे मारे हैं

खाट की दायीं तरफ से देखो

फलक बटोरा आधा है

और दूजे हिस्से को पूरी

कायनात का वादा है

कायनात जो आधी आधी

तेरी दोनों आँखों में

पैर पसारे बैठी है

और ऊपर गिरती पलकें हैं

जो मुंह मांगे से ज़्यादा है

कलाकार

कलाकार आम इंसानों में

शरीक़ नही होते…

उधर वो कूड़े के ढ़ेर में

खाना यूँ ढूँढ रही थी

इधर वो हैरानी

नज़र से कैमरे पर

यूँ छापे जा रहा था

उसकी भूख से शायद

इसकी कला का पेट

यूं भर रहा था

क्यूँ नहीं आगे बढ़ा वो

खाना खिलाने उस बच्ची को

ये क्यूँ उस ने महज़

तस्वीर उतारी उस मंज़र की

ये क्यूँ पूछना

कलाकार का काम नहीं

उसका कर्म है

कला उस की

वो वही करेगाा

क्या तुम ने कभी ये सोचा

की शायद वो भी भूखा था कई दिन का

या शायद उस की वो तस्वीर ही

उस का ‘क्यूँ’ थी

माड़ सा कहा करते थे

कलाकार आम इंसानों से

कहीँ बढकर होते हैं

उनमे शरीक नही होते

शायद…

सच ही कहा करते थे

बनते बिगड़ते बुलबुले

बरसात के पानी से

बनते बिगड़ते बुलबुले

मुझको याद दिलाते हैं

वो वक़्त जो हमने

साथ गुज़ारा था

और हाँ

फिर ये भी याद आता है मुझे

हमने कोई बरसात

साथ नहीं गुज़ारी

वो दोनों

एक वो है कि रोते हुए थकता ही नही
और एक ये है कि बस उसे रोता देखे जाए है

 

तगाफ़ुल की ओट में छुपते नही आंसू
गीला मुखौटा सूखने में देर लगाए है

 

चुप्पी की बारिश में भला क्या वो भीगेंगे
गिरती नहीं है बूंद कि हवा हो जाए है

 

दर्द देखो किसका और निजात पाए कौन
जल रही है लौ और मोम पिघला जाए है

 

धुंधला सा दिख रहा है दोनो को आजकल
जो लब से ना निकले वो आंखों पे छा जाए है

सीखने की ज़िद मे

सीखने की ज़िद मे तो बस सीखते ही रह गए
सीखना भी कभी सीख पायेंगे क्या

 

जो नहीं है वही दिखाई देता है बस
उसे दिखला भी दें पर दिखलायेंगे क्या

 

घर हमारा गर्द में और कहकशां पर नूर है
न जलायें जो दिल तो जलायेंगे क्या

 

ख्वाब है या सच है या फिर ख्वाब का ही इल्म है
खुलेंगी आंखे तो कह पायेंगे क्या

 

बेकरारी में लल्लन खुद से पूछा है बार बार
वो पूछेंगे क्या और हम बतलायेंगे क्या

फबेहा

मैं कई बार

गली क़ासिम जान तक आया

बैठा

गुज़रा

सुईवालान से लेकर

चूड़ीवालान तक

हांडा भी हूँ बहुत बार

दिल्ली घराने के तबले की

खोयी धमक की आरज़ू में

किले की देहलीज़ से लेकर

बल्लीमारान तक लेकिन

एक शक़्स ऐसा ना मिला

जो मिर्ज़ा की दिल्ली का बाशिंदा है

और उर्दूयी पैराहन में घूमे

हाँ लेकिन

एक उर्दू-दा अब सुनते हैं

रहा करती है वहां

डेढ़ सौ साल पुराने एक मकां में

जो शायद तब बना होगा

जब ‘असद’ के दीवान के सफों पर

सलवटें आई होंगी

बल्लीमारान में तो नहीं

बाकी की दिल्ली में लेकिन

सुना करते हैं

की उसकी जुबां में

मिर्ज़ा के मिसरे सी मिसरी है.

बारिशों के दरमियान लिखी गयी एक नज़्म

पास की पटरी से गुज़रती

रेलगाड़ी की आवाज़ पर जब

ताबड़-तोड़ पड़ती हुई

बारिश की परत भी पड़ती है

फिर जो आवाज़ आती है

उसे हम बयान नहीं कर सकते

बारिशों में चलती तेज़ हवाओं में

बेहिसाब झूमते हैं नीम के पेड़ सारे

ये जानते हुए भी

की ज़मीन को आसमान नहीं कर सकते

बिजलियाँ भी कौंधती हैं

गर्जन भी होती है

सब के सब सिर ढकते आधे अधूरे

अपने अपने घरों को भागते

साफ़ नज़र आते हैं

लेकिन कुछ दो चार जो भीगते हैं

उनकी पहचान नहीं कर सकते

दूर खिड़कियों से झांकते बेनूर से उजालों में

नूर सा भर जाता है

और जो बूँदें बच जाती हैं

उन्हें देर तक तकते रहने को जी चाहता है

बारिशें जब रूकती हैं

हम यही पूछते रह जाते हैं

हम सब कुछ ही क्यों नहीं

बारिशों के दरमियान कर सकते

ज़िन्दगी बतियाती है

ज़िन्दगी बतियाती है कुछ कुछ

ज़िन्दगी बतियाती है मुझ से हर रोज़

मैं भी औरों की तरह सोता हूँ जागता हूँ

मेरी नींदें उस फुटबॉल की तरह हैं

जो बरसों से खेल खेल कर फट चुकी है

और सिर्फ अलमारियों के नीचे पायी जाती है कभी कभी

सात समंदर पार रहने वाली एक शायरा

जो अब कुछ कम लिखा करती है

मुझे उसके ‘होने’ के ख्याल भर से मुहब्बत है

मेरे आस पास यहाँ जो शहर बसता है

वहां रहने वाले रोज़ अपनी जुबां बदल लेते हैं

चलो रोज़ नहीं , पर आये दिन तो बदल ही लेते हैं

मैं उनकी जबां नहीं बोल पाता हूँ

बेनूरी की चकाचौंध में आँखें चुंधियाती तो नहीं

बस आँखें खोलने को ही जी नहीं चाहता

हाँ मॉनसून आये तो बात अलग है

हवाएं कुछ और हैं

रौशनी अलग है

जज़्बात अलग हैं

मैं मॉनसून में बहुत बड़बड़ाता हूँ

ज़िन्दगी बतियाती है

कलम घिसाई की दास्तान तो

ना ही पूछो – बेहतर है

‘आर्ट’ है ये

बस उठाओ कलम

और दे मारो छीिंटें कागज़ पर

बे-सिर पैर

जितना काग़ज़ रंग जाए वो ‘तजुर्बा’ है

जो बच जाए उसे मैं ‘नज़्म’ बताता हूँ

खुद ही लिखता हूँ

खुद ही पढता हूँ

और खुद ही को सुनाता हूँ

 

ज़िन्दगी बतियाती है

ज़िन्दगी बतियाती है कुछ कुछ

ज़िन्दगी बतियाती है मुझ से हर रोज़

बरसाती

महका क्यूँ बरसता पानी रे
कह गया नई पुरानी रे

बरसी क्यूँ थी कहानी रे
और वो भी बेमानी रे

बैठी है बेगानी रे
पकड़े वो पेशानी रे

सब खाक में आनी जानी रे
रह गयी यार-निशानी रे

कुछ और समझ के मानी रे
फिर कुछ और बतानी रे

एक अरसे से वो सुना रही
एक अरसा और सुनानी रे