28 शिवालिक

ज़र्द सभी रातों के
सूने सूने से समंदर
कभी मेरे तो कभी तेरे दिल के अंदर
झुंझलाये हुए ख़्वाबों की लहरों में गोते लगाते
बहरूपिये मुस्तक़बिल के अय्यार बवंडर
सर-ए-आम सर-ए-ख़ास
ऐसे या वैसे वो सारे के सारे
सराबी से लबालब
हक़ीक़तों के मंज़र
गूंजते हैं जब बीचोंबीच ज़हन के
ज़लज़ले आते हैं फिर
सीरत-ए-सुखन के
छिटक देती है फिर ज़िन्दगी
पल भर को ऐसे रूह
मैं-मैं नहीं रहता
न तू रहती है तू
हमीं हम से जुदा कर दे
तुम ही बूझो ये बला क्या है
हम नहीं जानते
इस सिलसिले का
सिला क्या है