ज़िन्दगी बतियाती है

ज़िन्दगी बतियाती है कुछ कुछ

ज़िन्दगी बतियाती है मुझ से हर रोज़

मैं भी औरों की तरह सोता हूँ जागता हूँ

मेरी नींदें उस फुटबॉल की तरह हैं

जो बरसों से खेल खेल कर फट चुकी है

और सिर्फ अलमारियों के नीचे पायी जाती है कभी कभी

सात समंदर पार रहने वाली एक शायरा

जो अब कुछ कम लिखा करती है

मुझे उसके ‘होने’ के ख्याल भर से मुहब्बत है

मेरे आस पास यहाँ जो शहर बसता है

वहां रहने वाले रोज़ अपनी जुबां बदल लेते हैं

चलो रोज़ नहीं , पर आये दिन तो बदल ही लेते हैं

मैं उनकी जबां नहीं बोल पाता हूँ

बेनूरी की चकाचौंध में आँखें चुंधियाती तो नहीं

बस आँखें खोलने को ही जी नहीं चाहता

हाँ मॉनसून आये तो बात अलग है

हवाएं कुछ और हैं

रौशनी अलग है

जज़्बात अलग हैं

मैं मॉनसून में बहुत बड़बड़ाता हूँ

ज़िन्दगी बतियाती है

कलम घिसाई की दास्तान तो

ना ही पूछो – बेहतर है

‘आर्ट’ है ये

बस उठाओ कलम

और दे मारो छीिंटें कागज़ पर

बे-सिर पैर

जितना काग़ज़ रंग जाए वो ‘तजुर्बा’ है

जो बच जाए उसे मैं ‘नज़्म’ बताता हूँ

खुद ही लिखता हूँ

खुद ही पढता हूँ

और खुद ही को सुनाता हूँ

 

ज़िन्दगी बतियाती है

ज़िन्दगी बतियाती है कुछ कुछ

ज़िन्दगी बतियाती है मुझ से हर रोज़