हामी

ना सुखन से पहले

ना आरज़ू-ए-मुकम्मल के बाद

ना बादलों के पीछे

ना किसी तारे के नीचे

ना बेनूर अँधेरे

ना वो रोशन से दरीचे

ना ही तेरी गली की हद से लगती

सड़क के पार

गर मिलेगा सुकून तो बस

तेरी हामी में मिलेगा

तब तक तो सराबों पे फ़क़त

होवे इख्तियार