सोचूँ की क्या लिखूं

सोचूँ की क्या लिखूँ और लिख भी ना पाऊं मैं
कुछ लिखूँ तो तब जब ‘सोच’ पाऊँ मैं

 

इस ताक में की आएँगे वो कभी
बार-ए-बार खुद ही को आऊं मैं

 

बीच बाज़ार हाल-ए-दिल क्या बयान करूँ
घर मेरे आओ की बतलाऊँ मैं

 

खैरियत से हैं वो भी खैरियत से हूँ मैं भी
अब बतलाऊँ भी उन से तो क्या बतलाऊँ मैं

 

देखिये मुझे ‘लल्लन’ की रुख हवा का देखिये
हो जाए वो जिधर की वहीँ जाऊं मैं