सूखा

मेरे नैनों की खिड़कियों पर

बारिशों के परदे चढ़ा दो

की मेरे अंदर

मेरे घर के अंदर

गर रौशनी आती है

तो एहसास होता है

की मेरे भीतर की गहमा गहमी

गर यूँ साफ़ साफ़ दिखेगी

तो तांता लग जाएगा

ताकने झाँकने वालों का

मेरे ज़हन-ए-मकां की बातें

जो बाहर वालों के कानों में पड़ेंगी

तो अफवाहें उड़ेंगी

और दो की चार होंगी

फिर मैं कहाँ कैसे किस किस को

समझाता फिरूंगा

सबको मेरी मुफलिसी दिखेगी

की मेरे घर में दिन-रोज़ के साज़-ओ-सामन की कमी बहुत है

थोड़ी बहुत बस सावन की आरज़ू है

पिछली बारिशों की बची

आँखों में नमी बहुत है

सीले हैं मेरे दिल-ओ-दिमाग के सभी कोने

और बंजर हैं मेरी ख्वाइशें सारीं

मैं मेघदूत की आस में

जाने कब से यूँ ही बैठा हूँ

पर मृगतृष्णा आती है

वो नहीं आता

ज़मीनों में भी दरारें पड़ी हैं

मुन्नी का स्कूल छूटा है

मुन्ने से चला नहीं जाता

दो खेत बिक चुके हैं

उसके पैर के इलाज में

तीजा था आखिरी जो

जाड़े में बोया था

वो चला गया दोनों की बुआई के कर्जे के ब्याज में

जाने किस जनम का सावन मुझसे बदला ले रहा है

चुंधिया गयीं हैं आँखें मेरी

पिघले हुए लावे से सूरज की तपिश से

भूल गया हूँ

गीले का रंग कैसा होता है

मेरी आँखों से पीला हटा दो

मेरे नैनों की खिड़कियों पर

बारिशों के परदे चढ़ा दो