सुनो शायर

हो सकता है
की कभी ना हुआ हो
ख्वाब से चूल्हे में उठती
तमन्ना की आंच का
नकली ये धुआँ हो
यूँ भी तो हो सकता है
की हो ये महज़ टोटका कोई
किसी गुज़रते हुए जादूगर ने
बस ऐंवई फूंका हो
चलो मान लिया जाए
की ऐसा या वैसा
ये कुछ भी नहीं है
दिमागी बवाल है फकत
या होने से ज़्यादा
मुझे ना होने पर यकीन है
सुनो शायर
चुप रहो
आनन फानन ना बको
ढीठ ठहरे
ढीठ तुम
जो भी है
सो है
पहेलियां बनाने से अब
भला क्या ही मिलेगा
जो मिल रहा है वो भी
अघूरा ही मिलेगा
सुनो हासिल की आशिकी में
ये जो ‘है’ ना गवां देना
खुद ही बना के मर्ज़
फिर खुद ही ना दवा देना
‘असर’ है ये मेरी जान
यूँ ही पैदा नहीं होता
बीत जाती हैं मुद्दतें
नसीबन ऐसा नहीं होता
एहसास का दरिया है – समझो
बातें बनाना छोड़ दो
उस पार जाना है गर तुम्हें
उस पार जाना छोड़ दो