सुखन

बहुत कोशिश करने पर भी नहीं आती
दुआ आती है लबों पर इल्तजा नहीं आती

 

आतीं हैं मुझ तक सारी कायनात की आवाज़ें
बस इक तेरी ही सदा नहीं आती

 

महके हुए लम्हों में सांस लेना दूभर है
वक़्त में खुशबू क्यूँकर समा नहीं पाती

 

बुझा हुआ वक़्त भी अपने आप झुलस जाता है
हिज्र की तासीर आतिशी है विसाल की बरसाती

 

सुखन जो पनपे दर्द से वो सुखन नहीं है शिकवा है
लल्लन तुझे शायरी आते हुए नहीं आती