सीखने की ज़िद मे

सीखने की ज़िद मे तो बस सीखते ही रह गए
सीखना भी कभी सीख पायेंगे क्या

 

जो नहीं है वही दिखाई देता है बस
उसे दिखला भी दें पर दिखलायेंगे क्या

 

घर हमारा गर्द में और कहकशां पर नूर है
न जलायें जो दिल तो जलायेंगे क्या

 

ख्वाब है या सच है या फिर ख्वाब का ही इल्म है
खुलेंगी आंखे तो कह पायेंगे क्या

 

बेकरारी में लल्लन खुद से पूछा है बार बार
वो पूछेंगे क्या और हम बतलायेंगे क्या