सावन में एक रोज़

कुछ उधर मुंडेर पर

तितलियों की तरह

पंख फर्रा रही हैं

कुछ इधर फर्श पर

जलेबियां सी तल रही हैं

एक तो अभी अभी

भीत का हाथ पकड़

कुछ सहमी सहमी सी उतरी है

और वहां खिड़की के कांच पर एक

उँगलियों से बार बार

कुछ लिखती है

फिर मिटाती है

फिर कुछ लिखती है

फिर मिटाती है

 

छोटी छोटी बूँदें

छत पर खेल रही हैं

मैं बस बैठा ताक रहा हूँ