सफेदे

सड़क बाज़ारी बचपन में होती थी

वही बाबा फरीद की मज़ार के इर्द गिर्द

जहां चहलकदमी ज़्यादा थी

दुकाने थीं

सामान मिलता था

.

.
शाम गुज़ारी बचपन में होती थीं

वही सफेदे के पेड़ों के इर्द गिर्द

जहाँ चिड़ियाँ बहुत ज़्यादा थीं

अनगिनत शाखें थीं

उन्हें वहां आराम मिलता था

कई बरस बीत गए हैं इस सब को

बदल गया है सब कुछ मेरे पुश्तैनी मकान के इर्द गिर्द

.

.
उखड़ गए हैं सफेदे सारे

ज़मीन थीं ना वहां

बिल्डरों को नया मकान मिलता था

.

.
लेकिन गए शनिवार

वही बाबा फरीद की मज़ार…

भरे बाजार फिर कदम पड़े एक बार

.

.
तो सदा एक पुरानी

‘लाइव’ सुनाई पड़ी

.

.

शाम वहां कुछ चिड़ियों के साथ

बचे कुचे सफेदों के पीछे से

ज़ोर ज़ोर से चहक रही थी

हैरानी थी मुझे

यकायक वहां

किसी बीते ज़माने के मुझ तक पहुँचने की कोशिश का

बेचैन पैग़ाम मिलता था

 

खैर

शाम उस फ्लायओवर के दायीं तरफ भी

अच्छी ढला करती है

जिस से वापिस घर की ओर आते हैं

 

वहां भी कुछ सफेदे हैं

शायद वहां भी कुछ चिड़ियाँ रहती हैं

 

पर वो भी अब कट रहे हैं

मुन्सिपाल्टी के आर्डर से

फ्लायओवर डबल होगा

चिड़ियों का घरोंदा

बेशक ना कल होगा

कारें बढ़ गईं हैं शहर में

परिंदे कम हो चले हैं

 

सफेदे थे ना जहाँ

वहां मुझे मेरा जहां मिलता था

मेरी शाम अक्सर अब रोया करती है

बिना चिड़ियों के

ढलने को मना करती है