रोज़गार के सिलसिले

एक ज़िंदा लैंप
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और बिखरे थके ख़याल

बदहवास हैं नज़्में और शायर बेहाल

 

रोज़गार के सिलसिले और धूप सेंकती छत

ज़मीं पे बिखरे जवाब हैं आसमानों पर सवाल

 

नज़्म में गहरे गहरे गड्ढे कलम के छोटे पैर

लांघ जाए दीवार सुखन की किस की भला मजाल

 

आँख से टपका हवा हुआ और ज़हन को ले कर गोल गया

गिरा था जो आंसू ही था या था गिरा बवाल

 

भरी भरी सी ओखली भी तुझे लगेगी खोखली

इश्क़ में दे दे सिर और फिर मूसल का देख जमाल