यूँ ही

सिमटा के क्या कहें

बिखर के चलते हैं

कुछ ख्वाब काग़ज़ी

यूँ ही जलते हैं

सूरज के रुखसारों पर

चांदनी मलते हैं

हाय सबा के इश्क़ में

सुबह में ढलते हैं

किसी और की आँखों में

वो आंसू पलते हैं

कुछ गुनगुने से थे कभी

अब खूब उबलते हैं