महर

परायी किसी क़ायनात के

भूले हुए किसी वक़्त का

सबसे मशहूर बाशिंदा

‘शौकत’

ऊपरी दुनिया की

हसीन-ओ-अज़ीम-मल्लिका-ए-राज़-ओ-खुदा-सूरत-ए-आरज़ू

‘महर’

के दिल के तमाम राज़ जानता था

वो जानता था

की जिस दिन वो मैहर के साथ

एक चाल हो चला

उस दिन चिठ्ठा खुल जाएगा उस वहम का

जिसे सारे कायनाती ताक़त कहते हैं

और सब मान जाएंगे की खुदा जैसा

कुछ नहीं है

बस अफवाह की राख है

वक़्त की पैदाइश पर उड़ी थी

अब तलक उड़ रही है

और ना जाने कब तलक उड़ेगी

खैर…

खिल्ली उड़ेगी मानों की

और हर आलम को बांधे

कुदरत के सभी दरवाज़े एक-एक कर के टूटेंगे

सुपरनोवों की लड़ियाँ लगेंगी

और ना जाने कितने नए सितारों को जन्म देंगी

बहुत रौशनी होगी

..

बहुत ज़्यादा !!

..
क़यामत भी आ सकती है

आ सकती है क्या…यक़ीनन आएगी

और यूँ आएगी

की मैहर -मैहर  से ‘मैहरबान’ हो जाएगी