बॉम्बे ड्रीम्स

अमलतास के पीछे से
पच्छिम की ओर से आती है जो

पछुआ है की आस है वो

है सपन नगर के डाकिए की
साइकल की वो घंटी क्या

या माइग्रेटरी कोई चिड़िया है
किसी फैक्ट्री से उड़कर आई है

धनक कड़कती है ऊपर जब
तभी तो बिजली बनती है

फिर फलक पे कोयला मल मल क्यों जाने
‘ये’ बे-मतलब इतराते हैं

‘ये’ मानी वो वो सारे जो
पुरवा के हत्यारे हैं

वही जो मेहा-नीम-पहाड़ी-बेर-पलाश-गुरैया को
अब है सब और फिर भी जबरन
देखो इतिहास बताते हैं

रंग मिट चुका है
ख़याल के पर्दों का भी जब से वो
बे-मौसम की बारिश में
अक्सर यूँ ही धुल जाते हैं

अमलतास के पीछे से

जाता है धनक की घाटी का रस्ता
और सुनते हैं हम ये भी
ख्यालों के रंगरेज़ सभी

वहीँ पे पाए जाते हैं

वो दाम भी ठीक लगाते हैं
और काम भी बढ़िया करते हैं

बस थोड़ी बहुत मशक्कत है तो
घाटी तक का सफर है बस

अब पुरवाई के बाशिंदे

किस सोच में डूबे जाते हैं