बारिशों के दरमियान लिखी गयी एक नज़्म

पास की पटरी से गुज़रती

रेलगाड़ी की आवाज़ पर जब

ताबड़-तोड़ पड़ती हुई

बारिश की परत भी पड़ती है

फिर जो आवाज़ आती है

उसे हम बयान नहीं कर सकते

बारिशों में चलती तेज़ हवाओं में

बेहिसाब झूमते हैं नीम के पेड़ सारे

ये जानते हुए भी

की ज़मीन को आसमान नहीं कर सकते

बिजलियाँ भी कौंधती हैं

गर्जन भी होती है

सब के सब सिर ढकते आधे अधूरे

अपने अपने घरों को भागते

साफ़ नज़र आते हैं

लेकिन कुछ दो चार जो भीगते हैं

उनकी पहचान नहीं कर सकते

दूर खिड़कियों से झांकते बेनूर से उजालों में

नूर सा भर जाता है

और जो बूँदें बच जाती हैं

उन्हें देर तक तकते रहने को जी चाहता है

बारिशें जब रूकती हैं

हम यही पूछते रह जाते हैं

हम सब कुछ ही क्यों नहीं

बारिशों के दरमियान कर सकते