बरसाती

महका क्यूँ बरसता पानी रे
कह गया नई पुरानी रे

बरसी क्यूँ थी कहानी रे
और वो भी बेमानी रे

बैठी है बेगानी रे
पकड़े वो पेशानी रे

सब खाक में आनी जानी रे
रह गयी यार-निशानी रे

कुछ और समझ के मानी रे
फिर कुछ और बतानी रे

एक अरसे से वो सुना रही
एक अरसा और सुनानी रे