फबेहा

मैं कई बार

गली क़ासिम जान तक आया

बैठा

गुज़रा

सुईवालान से लेकर

चूड़ीवालान तक

हांडा भी हूँ बहुत बार

दिल्ली घराने के तबले की

खोयी धमक की आरज़ू में

किले की देहलीज़ से लेकर

बल्लीमारान तक लेकिन

एक शक़्स ऐसा ना मिला

जो मिर्ज़ा की दिल्ली का बाशिंदा है

और उर्दूयी पैराहन में घूमे

हाँ लेकिन

एक उर्दू-दा अब सुनते हैं

रहा करती है वहां

डेढ़ सौ साल पुराने एक मकां में

जो शायद तब बना होगा

जब ‘असद’ के दीवान के सफों पर

सलवटें आई होंगी

बल्लीमारान में तो नहीं

बाकी की दिल्ली में लेकिन

सुना करते हैं

की उसकी जुबां में

मिर्ज़ा के मिसरे सी मिसरी है.