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बे-ग़ैर

तेरे हाथों से लिखे

हर्फ़ की तमन्ना में जान दूँ

या इस बात पे जान दूँ

की वो मेरा नाम है शायद

किस सिम्त ऐ फ़क़ीरी…

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हामी

ना सुखन से पहले

ना आरज़ू-ए-मुकम्मल के बाद

ना बादलों के पीछे

ना किसी तारे के नीचे

ना बेनूर अँधेरे

ना वो रोशन से दरीचे…

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मेहा

ज़बीं से छू सको

तो चख लो सौंध

नीम की धुर्रियां

मानो इत्तर माफ़िक़

मटमैले और गेंहुए में…

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