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सुखन

बहुत कोशिश करने पर भी
नहीं आती

दुआ आती है लबों पर
इल्तजा नहीं आती

आती हैं मुझ तक…

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ख्वाबीदा

चाहे ख़्वाबों को

काग़ज़ों पर घिसूं

चिपकाऊं

या फिर यूं ही रख दूँ बस

ना तो पूरे घिसे जाते है

ना चिपकाए ना रखे जाते है मुझ से

कागज़ी ज़मीं पर पैर रखे नहीं की…

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यूँ ही

सिमटा के क्या कहें

बिखर के चलते हैं

कुछ ख्वाब काग़ज़ी

यूँ ही जलते हैं

सूरज के रुखसारों पर…

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सोचूँ की क्या लिखूं

सोचूँ की क्या लिखूं और लिख भी ना पाऊं मैं
कुछ लिखूं तो तब जब सोच पाऊं मैं

इस ताक में की आएँगे वो कभी
बार-ए-बार खुद ही को आऊं मैं

बीच बाज़ार हाल-ए-दिल क्या बयान करूँ…

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