दिल रखिये तो कुछ यूँ

दिल रखिये तो कुछ यूँ की आसरा दीजिये
ये भी ना गर दीजिये तो फिर क्या दीजिये

 

हवा भी ना होगी यूँ बीतेगी ज़िन्दगी
उन आँखों के तले ना बैठा कीजिये

 

फुरक़त-ए-आतिश में फुर्सत जले फ़ुज़ूल
यूँ भी तो खाक़ है जल के भी क्या कीजिये

 

है आलम की हों सदियों में मुकम्मल मज़ामीन
वो कहते है की लल्लन’ सोचा कीजिये