तुम मुझे कितना याद आते हो

अलसाई पहाड़ी के पीछे

जब डूब रहा होगा सूरज

और ख़ुशी के मारे

हवा में डूबीं

कूदेंगी सारीं चिड़ियाँ

तब मेरी छत पर आना तुम

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना याद आते हो

रंगीन सियाही में जब मैं

अपने इकसार ख्यालों को

ख़ुशी ख़ुशी यूँ ही ऐवईं

काग़ज़ पर बो देता हूँ

कभी किसी दिन ऐसे ही

फिर उस मंज़र के बीचों-बीच

मद्धम चाल में आना तुम

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना याद आते हो

ये गिरा चाँद जब दिन का पैर

निंदिया की दहलीज़ पड़ा

वो बुझी रात जब दोपहर के

काम का एक मरीज़ मिला

और वो टूटे सन्नाटे

यूं टुकड़े टुकड़े हो हो कर

हर रोज़ सितम ये जब सारे

मैं आसमान में बना के तारे

आँहें जड़ता जाता हूँ

तब जुगनू बन चमकाना दिल

और मुझे तुम बतलाना

तुम मुझे कितना…