चूल्हा

फिर रात तवे पर है

और चांद का उपला है

कुछ तारे झोंकेंगे और

याद जलाएंगे

इक ख्वाहिश बेलेंगे और

ख्वाब पकाएंगे

और इक खयाल की सजी हुई

थाली में खाएंगे

और जब भूखी नीयत मन का

गला सुखा देगी

तब आंखों की प्याली में थोड़ी

नींद उडेलेंगे

और पलक से सारे ख्वाब छानकर

कच्ची पी लेंगे