चकत

वो बादल की परछाई पर
जाने क्या रंगना चाहता है
अभी तो वो बरसा भी नही
सूरज भी अभी तो आधा है
उसे मना मना थक गया ज़हन

वो दिल पे रहम क्यूँ खाता है

उसकी भी गलती है नही पर
सोचा कुछ ज़्यादा ही है
भले बुझ गयी लौ-खयाल पर
ऐसा तो होता ही है
आते-जाते इक्का-दुक्का

झोंका रौशन कर जाता है

कमबख्त मुहब्बत बेपरवाह और
रोज़ नसीहत लेती है पर
जला दी हों आंखे तो
ऐसा-वैसा नज़र क्या आता है?

सूखे में भी उसको लेकिन
आंसू इक-आद ज़ियादा है
उसी में शायद डूबेगा वो

यही तो शायद चाहता है