ख्वाबीदा

चाहे ख़्वाबों को

काग़ज़ों पर घिसूं

चिपकाऊं

या फिर यूं ही रख दूँ बस

ना तो पूरे घिसे जाते हैं

ना चिपकाए

ना रखे जाते हैं मुझ से

कागज़ी ज़मीं पर पैर रखे नहीं की

मेरा हाथ छुड़ा

भाग लेते है ख्वाब

मैं भी फिर पीछे पीछे भागने की

मशक्कत नहीं करता

एक सर्द सा कोना ढूंढ कर

वहीँ पसर जाता हूँ

उधर वो

मुकम्मल की खिड़कियों से झांकते है

इधर मैं

उन्हें-मासूमियत और खुद को ताकता हूँ

इस फासले से उस ओर देखो

तो बहुत खुश से नज़र आते है ख्वाब

जब जी भर जाता है

तो मैं उन्हें वहीं छोड़

हक़ीक़त की सड़क का रुख कर लेता हूँ

कागज़ी ज़मीं के हरियाले मैदानों की घास

मेरे पैरों के माकूल नहीं

हाँ हक़ीक़त की तपती सी ज़र्द फटी सड़क

मेरे तलवों की हमशक़्ल है

छिल जाता हैं काग़ज़

इनके नीचे आकर

मैंने हक़ीक़त के सड़क पे पड़े

कई लहूलुहान ख्वाब भी देखे है

तभी तो चाहता हूँ की

ख़्वाबों को काग़ज़ों पर

घिस दूँ

चिपकाऊं

या बस यूं ही

सम्भाल कर रख दूँ

पर अफ़सोस

ना पूरे घिसे जाते है

ना चिपकाए

और ना ही सम्भाले जाते है मुझ से

ख्वाब अपने