खानाबदोश

उस की आँखों में छिपे ख्वाब को

उकेरा था मैंने

और धुंधली सहर का सूरज

उसे दिखाया भी था

बड़ी मन में थी सबा से बतियाने की उस के

उसे फुसफुसाती हवाओं ने

पास बुलाया भी था

वो धनक ढूंढ़ता घूम रहा था

शहर के कोने कोने में

तंग गलियों ने उसका हौसला

बढ़ाया भी था

घने कोहरे में गुम हो जाने की

लत सी पड़ गयी थी उसको

जाड़ों ने उसे बहुत

बहलाया भी था

वो परवाज़ था खुद

पहाड़ी चरवाहे की तमन्ना जैसा

खानाबदोशी का यक़ीनन

वो सरमाया ही था