किसी ख़याल में घोला था

किसी ख्याल में घोला था मैंने तुझे शायद

 

तूने गले लगाया था ना जिस रोज़

तेरी रूह पी गया था मैं कच्ची

जिस्म से जिस्म की ओख लगा कर

तेरे रुखसारों से

जब तक आंसू गिरते नहीं देखे थे मैंने

मुझे असल माने टीस के तब तक

शायद मिले ही नहीं थे

तूने एक बुलबुले सा फोड़ दिया

मेरी हस्ती का वो जो ग़ुबार था

जिस रोज़ मुझे ज़ुबानी पुकारा था तूने

मुझे यक़ीन है ये तू मानेगा नही

फिर भी बताये देता हूँ की मुझे यक़ीन है

काग़ज़ों के पीछे

सियाही के सहारे

अपने तखल्लुस की आड़ में

अब तलक

तुझ ही को ढूँढा है मैंने यक़ीनन

हाँ तू मेरा क़लाम है

हाँ तू मेरा क़लाम है

हाँ

तू ही मेरा क़लाम है

 

किसी ख़याल में घोला था मैंने तुझे शायद