किराएदार

टूटी फूटी दीवारों से

अशार लगा चूना झड़ रहा था

और छत पे चिपके

कागज़ के टुकडे भी

ज़ार ज़ार थे

रोशनी का कहीं नाम-ओ-निशान ना था

रोशनदानों पर स्याही

बुरी तरह फैल गयी थी

कुछ पुरानी नज़्मों के जाले

जाने कब से कोनों से लगे हुए थे

नज़्में बिकती नहीं हैं

ना थीं

ना इस ज़माने में

न उस ज़माने में

जो भी कमाई है वो

ये शायराना ज़िन्दगी है बस

तभी शायद

खुदा का किराएदार

दुनियावी ग़रीबी का मारा

ये शायर

किराया नही चुका पाया है

अब सुनते हैं कुछ ही दिनों में

मकान खाली कर देगा