काश

काश

ज़मीं की धड़कन

रुक जाए

और ठहर जाए

सब का सब

वक़्त मिट जाए

सब की ज़ुबानों से

और टूट कर कलाइयों से

गिर जाये

ज़मीं पर

फिर चांदनी के संग

फुर्सत ही फुर्सत बिखरे

और काली घटा के पीछे से

उजले चाँद की माफ़िक़

नज़र पे आओ तुम

काश !