कल का ख़्वाब

सुनना ज़रा हवाओं से
कल रात
संग सारी कायनात
उन्हें भी
तुम्हारी सी कुछ
सुना रहा था
ज़मीं-आसमां के
सटे सटे से कानों में
तुम सा ही कुछ गूँज रहा था
चाँद पे भी तो
पिछली शब को
तुम सा ही कोई बना हुआ था
कल ही की तो बात है जब वो
सीधी सी एक ज़ुल्फ़ तुम्हारी
बेसुध हवा ने लहराई थी
कल ही था जब
नैन तुम्हारे
सूखी सी इस धरती पर
बनकर मोती बरसे थे
कल ही था जब
पलक तुम्हारी
लेटे लेटे साहिल पर
शाम का सूरज गिरा रहीं थीं

कल ही की ये बातें है सब
मुझे ये मेरे ख्वाबों ने अब
सुबह सुबह बतलाईं है