एक डायरी के ख़्वाब

ना ये डिजिटलिस्म होगा

ना मुल्ला

या पंडित कोई

ना होंगे खचाखच भरे हुए

मेट्रो के वो डब्बे

आँखों को बेहिसाब जलाते

इर्द गिर्द

इश्तेहार भी नहीं दिखने पाऐंगे

देखना

पर्चे ही पर्चे बंट रहे होंगे हर बस तरफ

इंक़लाबी शायरी में सने होंगे सब के सब

हुजूम तो होगा

पर यूं नहीं की रौंद दे

गले मिलेंगे कम से कम

दो चार सौ एक साथ

एक लेक्चर से भागे हुए

ख्वाबीदा से कुछ चेहरे

चौक में

दोपहरों में

खड़े होंगे बुत बने

ताज़ा नज़्मों के इंतज़ार में

जेल के उस पार

सुर्खियां नहीं होंगी

ऐलान मिलेंगे

फैज़ियत से लबालब

इंसान मिलेंगे

.

.

.
1943 होगा

एक लाइब्रेरी होगी

और तुम्हारी डायरी के

उड़ते हुए पन्ने  होंगे