एक इंडस्ट्रियल स्मॉल टाउन की ढलती शाम

एक इंडस्ट्रियल स्मॉल टाउन की ढलती शाम में

सड़क पे चलते हुए जब

दूर

छतों की लकीरों के ऊपर से

धुंआ नज़र आता है

तो किसी को ये बिलकुल नहीं लगता

की कहीं आग लगी है

ख्वाइशें इस शहर में

रेल की पटरियों पर सारा दिन

मंज़िलों की तलाश में धूप सेंकती हैं

कोई स्टेशन भी गर आता है तो

याद आती है बस

मंज़िल नहीं आती

अमीरों की बड़ी गाड़ियों

और गरीबों की साइकलों में फ़क़त

पहियों की गिनती भर का फ़र्क़ है

और दिन-ब-दिन घुट के मरते हुए

पडोसी पहाड़ों और जंगलों को

शहर के बीचों-बीच देख कर

यूँ लगता है

जैसे किसी घिसे हुए सरकारी हस्पताल का

पब्लिक वार्ड हो

हर चिड़िया चहचहाने की भीख मांगती है

और हर ज़र्रे पर रोज़ एक नया ज़र्रा चढ़ जाता है

शहर मानूस है

या मायूस

या तो वो परेशान जानता है

या फिर वो

जो कुछ नहीं जानता

 

ख्वाइशें इस शहर में

रेल की पटरियों पर सारा दिन

मंज़िलों की तलाश में धूप सेंकती हैं

कोई स्टेशन भी गर आता है तो

याद आती है बस

मंज़िल नहीं आती

अमीरों की बड़ी गाड़ियों

और गरीबों की साइकलों में फ़क़त

पहियों की गिनती भर का फ़र्क़ है

और दिन-ब-दिन घुट के मरते हुए

पडोसी पहाड़ों और जंगलों को

शहर के बीचों-बीच देख कर

यूँ लगता है

जैसे किसी घिसे हुए सरकारी हस्पताल का

पब्लिक वार्ड हो

हर चिड़िया चहचहाने की भीख मांगती है

और हर ज़र्रे पर रोज़ एक नया ज़र्रा चढ़ जाता है

शहर मानूस है

या मायूस

या तो वो परेशान जानता है

या फिर वो

जो कुछ नहीं जानता