इस नज़्म को ध्यान से सुनना

ज़रा ध्यान लगा के सुनना

इस नज़्म में

छोटे बड़े

सभी पंछियों की चहक है

धुंधले बादलों के पीछे

रंग रोगन करते

सूरज की गुनगुनाहट है

और तुम्हे पुकारती

मद्धम चाल चलती

पछुआ की फुसफुसाहट है

बहुत दूर बन रही

बहुमंज़िला ईमारत की

आखिरी मंज़िल पर खेलते

मज़दूरों के बच्चों की खिलखिलाहट

और तड़के की बारिश की

अधसूखी बूँदों की

सौंधी सी गूँज है

इस नज़्म को ध्यान से सुनना

ये नज़्म नहीं

ये असल में

मेरे टैरेस पर बिखरी हुई

शाम की आवाज़ है